पर्दे पर संवेदनाएं सांस लेती हैं- जान्हवी बंसल
पर्दे पर संवेदनाएं सांस लेती हैं- जान्हवी बंसल
पंजाब के बरनाला ज़िले के छोटे से कस्बे तपा मंडी में जन्मी जान्हवी बंसल की जीवन यात्रा किसी सुनियोजित अभिनय-करियर की कहानी नहीं बल्कि मंच और अभिव्यक्ति के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण की परिणति है। दसवीं कक्षा तक माता-पिता के साथ रहकर पढ़ाई करने के बाद उन्हें चंडीगढ़ के हॉस्टल भेज दिया गया। वहीं से उनके जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसमें पढ़ाई, मंच, नाटक और आत्मविश्वास साथ-साथ पनपते चले गए। पिछले दिनों उनके साथ हुई बातचीत पढ़ें गंगानगर वाला पर। जान्हवी जल्द ही ‘द लास्ट लैटर’ फ़िल्म में नजर आने वाली है। फिलहाल ‘द लास्ट लैटर’ फ़िल्म समारोह की राह पर है-

ग्यारहवीं-बारहवीं से लेकर स्नातक, स्नातकोत्तर और वेब डिज़ाइनिंग तक उनकी समूची शिक्षा पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से हुई। पढ़ने-लिखने के प्रति गहरी रुचि और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा रही। लेकिन जितनी गंभीरता से उन्होंने पढ़ाई की, उतनी ही शिद्दत से वे हर मंचीय गतिविधि का हिस्सा भी बनीं। स्कूल और कॉलेज में शायद ही कोई ऐसा सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा हो, जिसमें जान्हवी मंच पर न दिखाई दी हों। वे स्वयं हँसते हुए कहती हैं कि उन्हें मंच पर चढ़ने के लिए बस एक बहाना चाहिए चाहे प्रतियोगिता पाँच रुपये की चॉकलेट की ही क्यों न हो।

पंजाब के बरनाला ज़िले के छोटे से कस्बे टप्पा मंडी में जन्मी जान्हवी बंसल की जीवन यात्रा किसी सुनियोजित अभिनय-करियर की कहानी नहीं बल्कि मंच और अभिव्यक्ति के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण की परिणति है। दसवीं कक्षा तक माता-पिता के साथ रहकर पढ़ाई करने के बाद उन्हें चंडीगढ़ के हॉस्टल भेज दिया गया। वहीं से उनके जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसमें पढ़ाई, मंच, नाटक और आत्मविश्वास साथ-साथ पनपते चले गए।
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हॉस्टल जीवन ने उन्हें सीमित नहीं किया बल्कि भीतर के कलाकार को और अधिक सक्रिय कर दिया। बाहर जाने की अनुमति न होने पर, हॉस्टल के मित्रों के साथ नाटकों की रिहर्सल, अभिनय और प्रस्तुति यही उनका संसार बन गया। इस तरह उनका अधिकांश जीवन नाटक, अभिनय और प्रदर्शन के इर्द-गिर्द ही आकार लेता गया।

दिलचस्प तथ्य यह है कि अभिनय को करियर बनाने का विचार उनके मन में कभी योजनाबद्ध ढंग से नहीं आया। वे एक पारंपरिक, व्यवसायिक अग्रवाल परिवार से आती हैं, जहाँ अभिनय को पेशे के रूप में देखने की परंपरा नहीं रही। यदि वे अभिनेत्री न होतीं, तो उनके पास विकल्पों की कमी नहीं थी पीएमटी, लॉ, बी.एड. जैसी परीक्षाएँ वे पहले ही उत्तीर्ण कर चुकी थीं और वेब डिज़ाइनिंग में भी प्रशिक्षित थीं। संभवतः किसी बड़ी कंपनी में वेब डिज़ाइनर के रूप में कार्यरत होतीं। अभिनय का अभ्यास उन्होंने औपचारिक थिएटर से ही पाया। स्कूल-कॉलेज के नाटकों से लेकर हालिया वर्षों में सौरभ शुक्ला, ललित प्रकाश, रंजीत कपूर, विनीत विरेन चोपड़ा और मुकेश छाबड़ा जैसे वरिष्ठ रंगकर्मियों के साथ वर्कशॉप्स तक उनकी रंगयात्रा निरंतर समृद्ध होती गई। वर्तमान में वे चंडीगढ़ में निर्देशक उमेश कांत के साथ ‘माउस ट्रैप’ नाटक की रिहर्सल में व्यस्त हैं। निर्देशन में फिलहाल उनकी रुचि नहीं है; वे साफ़ कहती हैं कि उन्हें परदे के सामने रहना अधिक प्रिय है कैमरे से उनका प्रेम साफ झलकता है।

उनकी पहली कास्टिंग किसी ऑडिशन कक्ष में नहीं बल्कि सोशल मीडिया से हुई। एक म्यूज़िक डायरेक्टर ने उनकी तस्वीरें देखकर उन्हें सीधे म्यूज़िक वीडियो ऑफ़र किया। इसके बाद उन्होंने एक पंजाबी टेलीविज़न सीरियल से अभिनय की औपचारिक शुरुआत की। घर से भेजा गया परिचयात्मक वीडियो और ऑडिशन क्लिप उन्हें इस क्षेत्र में आगे ले गया। इसके बाद ‘उड़ारियां’ और ‘जुनूनियत’ जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में उनका अभिनय देखा गया।
जान्हवी का अनुभव सिर्फ़ हिंदी या पंजाबी सिनेमा तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण भारतीय सिनेमा, विशेषकर मलयालम फ़िल्म ‘अ मलयाली फ्रॉम इंडिया’, उनके लिए सांस्कृतिक और भाषायी दृष्टि से अनोखा अनुभव रहा। भाषा न समझ पाने के बावजूद सेट पर बना अपनापन, आपसी शरारतें और नए भोजन का अनुभव सब कुछ उन्हें आज भी याद है। वे बताती हैं कि कैसे मलयालम में लिखी स्क्रिप्ट को पहले अंग्रेज़ी में समझाया जाता था और फिर वे स्वयं अपने संवाद हिंदी में गढ़ती थीं। यह अनुभव उनके लिए अभिनय-विद्यालय से कम नहीं था।
अभिनय के लिहाज़ से उनके जीवन का निर्णायक मोड़ फ़िल्म ‘इमेजिनरी रेन’ रही, जिसके निर्देशक विश्वविख्यात शेफ़ और फ़िल्मकार विकास खन्ना हैं। शबाना आज़मी और प्रतीक बब्बर के साथ काम करना उनके लिए किसी तपस्या से कम नहीं था। शबाना आज़मी के अभिनय को वे ‘अभिनय नहीं, जीवन जीना’ कहती हैं। बिना स्क्रिप्ट हाथ में लिए, बिना रिटेक उनका सहज अभिनय जान्हवी के लिए एक जीवंत पाठशाला था। इसी फ़िल्म के एक दृश्य में, जब उनके सभी संवाद काट दिए गए और केवल भावों के सहारे दृश्य निभाने को कहा गया, तब जो आत्मविश्वास और मार्गदर्शन उन्हें विकास खन्ना से मिला वह उनके करियर की अमूल्य पूँजी बन गया। उस टेक के बाद मिला स्टैंडिंग ओवेशन आज भी उनके लिए किसी ऑस्कर से कम नहीं।
आज जान्हवी बंसल के खाते में कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट हैं नेटफ्लिक्स सीरीज़ ‘शक’ में सिस्टर लोयोला का सशक्त किरदार, ‘सब फ़र्स्ट क्लास’ में वरुण शर्मा, कुशा कपिला और शहनाज़ गिल के साथ काम, ‘गुस्ताख़ इश्क़ गुस्ताखियाँ’ में विजय वर्मा, फ़ातिमा सना शेख और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकारों के साथ अभिनय। पंजाबी सिनेमा में ‘हैप्पी खुश हो गया’, ‘चंगेज़’ और ‘इश्क़ां दे लेखे’ जैसे प्रोजेक्ट्स भी उनकी विविधता को रेखांकित करते हैं। इसके अतिरिक्त, सामाजिक सरोकारों से जुड़ी डॉक्यूमेंट्रीज़ में उन्होंने माँ की भूमिकाएँ निभाई हैं।
लेखन और संगीत से उनका रिश्ता भी गहरा है। शिवकुमार बटालवी उनके प्रिय कवि हैं उनकी रचनाओं का दर्द और सच्चाई उन्हें भीतर तक छूती है। नुसरत फ़तेह अली ख़ान की क़व्वालियाँ और गुलज़ार की रचनाएँ उनके एकांत के साथी हैं। वे स्वयं भी डायरी में अपने मन के संवाद लिखती हैं अपने लिए, अपने समय के लिए। अपने आदर्शों में वे शबाना आज़मी और नीना गुप्ता को रखती हैं उनकी गरिमा, आत्मविश्वास और उम्र को ताक़त में बदलने की कला उन्हें प्रेरित करती है। ओटीटी और सिनेमा के सवाल पर वे स्पष्ट हैं ओटीटी आज का रंगमंच है, लेकिन सिनेमा का जादू, बड़े पर्दे पर तालियों की गूंज, उन्हें सबसे अधिक रोमांचित करती है।
अच्छे प्रोजेक्ट्स के साथ उनके करियर में बदलाव आया है कास्टिंग डायरेक्टर्स का भरोसा, बेहतर स्क्रिप्ट्स और दर्शकों की प्रतिक्रिया। जब कोई दर्शक स्क्रीनशॉट भेजकर कहता है कि “आपका काम देखा”, तो वही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है। जान्हवी बंसल की यह यात्रा बताती है कि अभिनय केवल पेशा नहीं, बल्कि संवेदनाओं को जीने की कला है और जब कलाकार मंच, कैमरा और जीवन तीनों को एक साथ जीता है तब कहानी यूँ ही सिनेमाई हो जाती है।



