रिव्यू- ‘जानलेवा इश्क़’ यारा रे यारा रे

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स्टेज ओटीटी हरियाणा का तेजी से उभरने वाला प्लेटफ़ार्म। जिसके लिए सबसे पहले अपन ने रिव्यू लिखने शुरू किये स्टेज के आग्रह पर ही लेकिन अपन ही थे जिसने इन्हें खूब सहारा दिया अपने रिव्यू से लगातार फ़िर जब सुधार होते नहीं दिखा तो रिव्यू में भर-भर आलोचाएं भी की और एक दिन रिव्यू लिखने ही बंद कर दिए स्टेज के लिए। लेकिन हाल में रिलीज हुई स्टेज ओटीटी की फ़िल्म ‘जानलेवा इश्क़’ ने अपना ध्यान खींचा तो लीजिए रिव्यू हाजिर है… गंगानगर वाला पर

हरियाणा में कहीं नशा और क्राइम लगातार बढ़ रहा है शक है एक ड्रग डीलर और मर्डर करने वाले संजू बाबा पर। हरियाणा पुलिस में तैनात इंस्पैक्टर कविता राठी होशियार है अपराधियों को पकड़ने में। गाँव के अमित बाबू पर पुलिस को शक है क्योंकि उसके घर आया था संजू बाबा। कहानी खुलती है तो पता चलता है कि अमित की घरवाली पूजा और संजू एक ही गांव के है। बचपन में दोनों साथ पढ़े और पढ़ते-पढ़ते दोनों को प्यार हो गया। लेकिन संजू की जात और औकात अलग थी इसलिए उनकी शादी न हो सकी। संजू ठहरा नीची जात का गरीव लड़का और पूजा एक बड़े परिवार और नेता की बेटी दोनों के सपने थे डॉक्टर बनने के मगर एक दिन…. अमित ड्रग डीलर और कातिल बन गया आख़िर क्यों?

कहानी जितनी रोचक है सुनने में उससे भी कहीं ज्यादा रोचक है देखने में। फ़िल्म के निर्देशक हेमंत आर प्रदीप अपनी इस पहली ही फ़िल्म से इतना तो भरोसा जीत जाते हैं कि उनका बनाया सिनेमा देखा जाए और उनसे यह उम्मीदें भी बढती हैं कि वे इस फ़िल्म का दूसरा पार्ट लेकर आएंगे और मजबूत कहानी के साथ ताकि इस फ़िल्म के अंत में छूटने वाली इसकी कहानी इसके सिक्वल से पूरी हो सके। हालांकि फ़िल्म शुरू में धीमे चलती है इतनी की इसे बीच में रोकने का दिल चाहे लेकिन मध्यांतर तक आते आते 1 घंटे 18 मिनट की यह कहानी जिस रफ़्तार को पकड़ती है फिर उसे छोड़ती नहीं इसी बीच इसमें आने वाला एकमात्र गाना ‘यारा रे यारा रे’ कर्णप्रिय लगता है, लुभाता है मन को मोहता है।
निर्देशक हेमंत आर प्रदीप को चाहिए कि वह ऐसे ही हरियाणा के साथ-साथ राजस्थानी सिनेमा में भी कदम बढ़ाए ताकि यहाँ ले देकर बचे हुए एक दो अच्छे फ़िल्मकारों की कोटि में उनका भी नाम शामिल किया जा सके। पूजा के किरदार में ऐश्वर्या आर्या प्रभावी लगीं तो वहीं संजू बने विक्रम मालिक का किरदार और सिनेमा में उनका दखल ही इस बात का प्रमाण है कि कुछ रोचक देखने को मिलेगा। महेश बलराज, अजय शर्मा, रमनदीप, रमेश कुंडू, श्याम वशिष्ठ, नेहा अपने अपने काम से फ़िल्म के कद और निर्देशक की उम्मीदों को बनाए रखने में सहयोग करते हैं। कुशल भारद्वाज ने संजू के पिता में जिस तरह खुद को ढाला है वह काबिल-ए-गौर है। तो वहीं अर्चना राव खडूस इंस्पैक्टर कविता राठी के किरदार के साथ न्याय करते हुए पूरी तरह ढल जाती हैं। उन्हें मिले संवाद भी उनकी भूमिका को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

प्रवेश राजपूत की लिखी कहानियों ने नैशनल अवार्ड भी जीते हैं हरियाणा में तो लाजमी है कि कहानी उम्दा होगी ही लेकिन जिस तरह इस फ़िल्म की कहानी और इसके स्क्रीनप्ले को लिखने में एक जगह सचिन बांगर चूके हैं वहीं यह फ़िल्म उन चंद लम्हों के लिए हाल में सोनी लिव पर आई वेबसीरिज ‘द हंट’ से बुरी तरह प्रभावित दिखती है। बावजूद इसके यह प्रवीण चौहान के म्यूजिक और उनके लिखे गये बेहद सुरीले गीत, शुभम् सैनी के डीओपी, हेमंत सिंह सिसोदिया की एडिटिंग सहज रंधावा का बैकग्राउंड और सालिक वकास की कलरिंग मिलकर स्टेज एप्प पर इस फ़िल्म को एक बार देखने लायक जरुर बनाती है।
‘जानलेवा इश्क़’ जैसी लम्बे समय बाद स्टेज की कोई फ़िल्म देखकर आप भी कहेंगे कि कुछ तो बदलाव चलो आया चाहे मेरे रिव्यू से चाहे अंदरूनी आलोचनाओं और गॉसिप्स से लेकिन यह बदलाव यदि सचमुच में आया है तो हरियाणवी सिनेमा में एक नया अध्याय स्टेज एप्प के नाम से लिखा जाएगा।
अपनी रेटिंग… 4 स्टार