यात्राएं यादों के इडियट बॉक्स से

इस किले में आज भी झांसी की रानी दरबार लगाती हैं!

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई आज 195 बरस की हो चुकी हैं। अपने जीवन में अब तक गंगानगर वाला रानी झाँसी को दरबार लगाते हुए दो बार देख चुका है। आज झाँसी की रानी के दरबार और रानी के जीवन से जुड़ी कुछ जानकारियाँ यादों के तौर पर अपने यादों के इडियट बॉक्स से आप लोग के लिए लेकर आया है। झांसी की रानी को हमारा दंडवत नमन। तो चलिए आज हमारे साथ झांसी की रानी के दरबार रानी का जन्मदिन मनाते हुए और जानिये किस किले में आज भी झाँसी की रानी दरबार लगाती हैं!

हिंदी की महनीय कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी कविता ‘झांसी की रानी’ कविता तो हम सभी बचपन में ही पढ़ आये हैं- वे लिखती हैं

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

आज ही के दिन 19 नवम्बर साल 1828 में जन्मी एक ऐसी वीरांगना जो तब के मराठा शासित राज्य झांसी की रानी बनी। हालांकि उनके रानी बनने के पीछे की कहानी जितनी दिलचस्प है उससे कहीं ज्यादा हमारे आज के आज़ाद देश में सांस ले पाने की कहानी उससे भी कहीं अधिक दिलचस्प है। एक ऐसी वीरांगना जिसके लिए जितना लिखा जाएगा उतना ही कम होगा। अंग्रेजों से जमकर लड़ने वाली वो मतवाली लड़की यदि इस हिन्दुस्तान देश में ना जन्मी होती तो संभवत आज भी हम उसी गुलामी की दासता में सांसों को घुटता हुआ पाते। 1857 की क्रांति को जन्म देने वाली इस वीरांगना ने केवल 29 सावन ही पाए। लेकिन महादेव की अनन्य भक्त रानी लक्ष्मी निश्चित तौर पर हमेशा- हमेशा के अमर हो अपना नाम स्वर्णाक्षरित करवा गईं।

अंग्रेजों से लड़ते हुए तलवार लगने के कारण वीर गति को प्राप्त हुई रानी लक्ष्मी के जीवन से जुड़ी लगभग हर कहानी आज किताबों, लेखों और इंटरनेट की दुनिया में बिखरी पड़ी हैं। काशी में जन्मी और फिर झांसी के नरेश से ब्याही गई लक्ष्मी बाई की जाति को भी लोगों ने खोज निकाला और उनके कराडे ब्राह्मण होने के नाम पर दंभ भरती कुछ जातियां अफ़सोस की यह भूल बैठी हैं कि ऐसी महान विभूतियों को की प्रकार के जात-धर्म से नहीं तौला जा सकता। उनकी केवल एक ही जाति और एक ही  धर्म होता है वह है ‘मातृभूमि’।

यूँ तो हिंदी साहित्य में वृन्दावन लाल वर्मा कृत उपन्यास ‘झांसी की रानी’ सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना गया है लेकिन इसके साथ ही सुभद्रा कुमारी चौहान के अलावा एक और चीज है जिसने रानी के जीवन की महागाथा को हर घर तक पहुँचाया। वह है जी टीवी पर प्रसारित हुआ धारावाहिक ‘एक वीर स्त्री की कहानी- झांसी की रानी’ जो साल 2009 से 2011 के बीच प्रसारित हुआ। धर्मेश शाह, मनीष शाह, धर्मपाल धीमन,प्रसाद गंवांडी द्वारा संयुक्त रूप से निर्देशित ही धारावाहिक के करीब 480 एपिसोड प्रसारित किये गये थे। बचपन के नाम मणिकर्णिका ताबें को आधार बनाते हुए कंगना रानौत ने ‘मणिकर्णिका’ नाम से फिल्म का भी निर्माण किया। और भी बहुत कुछ इस वीरांगना पर लिखा-रचा-बनाया गया और रहती दुनिया तक लिखा-रचा-बनाया जाता रहेगा। अमूमन हमारे भारतीय समाज में स्त्रियों को उनके पतियों के नाम से ज्यादा पहचाना गया है लेकिन रानी उन सबमें एक अलग अपवाद हैं जिन्हें केवल रानी लक्ष्मी बाई के नाम से ही प्रसिद्धि मिली। बेहद कम लोग ही उन्हें गंगाधर राव की पत्नी के नाम से याद रखते होंगे।

इस किले में आज भी झांसी की रानी दरबार लगाती हैं!
झांसी की रानी का किला

रानी न केवल एक कुशल सैन्य नेता थीं बल्कि वे राजनीतिक रूप से भी काफी कुशल एवं चतुर शासक थीं। जिनसे आज के राजनेता भी राजनीति का ककहरा सीख सकते हैं। माँ भागीरथीबाई और पिता मोरोपंत तांबे की संतान मनु को अपनी माँ और पिता से विरसे में ही सुसंस्कृत, बुद्धिमानी, धर्मनिष्ठ होने के गुण मिले थे। घर में मनु की देखभाल के लिए किसी के ना होने के चलते उनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार ले जाते। वहीं पर मनु को ‘छबीली’ नाम भी मिला और युद्ध में लड़ने की शिक्षा के साथ-साथ शास्त्रों का अध्ययन करने का भी मौका मिला। 1842 में गंगाधर राव से ब्याह के बाद 1851 में एक बच्चे को रानी ने जन्म दिया किन्तु चार माह की उम्र में ही वह चल बसा। इसके कुछ समय बाद राजा गंगाधर को दत्तक पुत्र लेना पड़ा। दत्तक पुत्र दामोदर को गोद लेने के बाद एक बार फिर से रानी के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। राजा गंगाधर की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने दामोदर को रानी का बेटा मानने से इनकार कर दिया और फिर युद्ध में रानी को प्राण गवानें पड़े। लेकिन अपने मरते दम तक झांसी को अंग्रेजों के हवाले ना करने की कसम खाए बैठी रानी के शहीद हो जाने के बाद भले ही उनके किले पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया हो लेकिन रानी हम भारतीयों ही नहीं अपितु दुनिया के हर संवेदनशील इंसान के मन में गहरे बैठ गईं।

इस किले में आज भी झांसी की रानी दरबार लगाती हैं!
झाँसी की रानी का स्मारक

लेकिन आज भी भारत सरकार ने रानी के किले को संरक्षित रख रानी को हमेशा के लिए जिंदा रखा है। वहाँ अपने जीवन में दो बार रानी के महल को देख चुका हूँ। दोनों ही बार महल से लौटते हुए आँखों में पानी को उतरते हुए पाया। देखा कि किस तरह हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने हम आज़ाद हवा में सांस के पायें इसके लिए संघर्ष किया। ऐसे हजारों-हजार बच्चे-युवा, लड़के-लड़कियां, तुरंत ब्याही और तुरंत विधवा कर दी गईं महान विभूतियाँ अगर हमारे देश में जन्म ना लेती तो आज भारत कैसा होता? क्या हम आज़ाद हो पाते? क्या आज जो हम धर्म-जाति आदि के आधार पर भेदभावों की राजनीतियाँ कर अपनी रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं यह सब संभव हो पाता? इन बातों पर विचार अवश्य कीजिएगा। और हाँ कभी झांसी जाना हो तो झांसी की रानी का किला अवश्य देखिएगा यकीनन आपके दिल में उठने वाले हर सवाल और हर भेदभाव के हल स्वत: हासिल हो जायेंगे।

इस किले में आज भी रानी झांसी के जीवन को दर्शाती हुई फिल्म भी प्रदर्शित की जाती है तो महल से लौटते हुए उसकी रज को अपने माथे पर लगाकर खुद को पवित्र अवश्य कीजिएगा साथ ही शाम के समय झांसी की रानी के जीवन को दर्शाती फिल्म भी अवश्य देखिएगा। आपको मालुम होगा की रानी किस तरह अपना दरबार लगाती थीं और किस तरह अपने जीवन को जीती थीं

इस किले में आज भी झांसी की रानी दरबार लगाती हैं!
झाँसी की रानी की याद में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई कभी ना मरी थीं, ना मरेंगी। वे हमेशा-हमेशा के लिए रहती दुनिया तक हमारे दिलों में, हमारे जेहन में ज़िंदा रहेंगीं और हमें देश प्रेम की लोरियां सुनाती रहेंगी। गंगानगरवाला रानी के जीवन पर यह कुछ मनोभाव लिखकर उन्हें जन्मदिन की हजारों हजार बधाईयाँ देता है। इस विश्वास के साथ की पुन: रानी अवश्य हमारे बीच शाश्वत और स्थूल शरीर के साथ अवश्य आयेंगीं। अगर जश्न मनाने का दिन है रानी 195 बरस की हो गईं हैं। .

 

 

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